दुर्गेश साहू धमतरी। जिले में विकास की कहानी अक्सर बड़ी खूबसूरत दिखाई देती है। मंच सजे होते हैं, फीते कटते हैं, शिलान्यास होते हैं और उपलब्धियों के आंकड़े सामने रख दिए जाते हैं। तस्वीर भी ऐसी कि लगे शहर ने विकास की लंबी छलांग लगा दी है। मगर इसी चमकती तस्वीर से थोड़ा बाहर निकलकर देखें तो कहीं सड़क गड्ढों में मिलती है, कहीं नाली अधूरी है तो कहीं मूलभूत सुविधा के लिए लोग अब भी इंतजार कर रहे हैं। बस यहीं से पत्रकारिता की असली परीक्षा शुरू होती है। जो नजर आम आदमी की परेशानी देखती है और जो कलम उस परेशानी को शब्द देती है, वही व्यवस्था का आईना बनती है। आईने में चेहरा जैसा है, वैसा ही दिखाई देगा। चेहरे पर शिकन हो तो आईने की गलती नहीं होती। मुश्किल तब शुरू होती है, जब खबर विकास के दावों और जमीन की हकीकत के बीच का फर्क दिखा देती है। सवाल उठते हैं तो जिम्मेदारों को खबर नागवार गुजर सकती है। लेकिन सवाल न उठें, कमियां न दिखें और सब कुछ ठीक होने का भ्रम बना रहे, तो नाराजगी जनता की होती है। पत्रकारिता किसी के पक्ष में खड़े होने का नाम नहीं, सच के पक्ष में खड़े रहने का नाम है। कलम का काम तालियां बटोरना नहीं, जरूरत पड़ने पर सवाल पूछना भी है। क्योंकि सत्ता और व्यवस्था को सबसे ज्यादा जरूरत उसी आईने की होती है, जिसमें तारीफ के साथ कमी भी साफ दिखाई दे। इसलिए विकास का दस्ता थोड़ा अजीब है सच लिखो तो कुर्सियां खफा, सच न लिखो तो गलियां खफा। और पत्रकार के सामने रास्ता सिर्फ एक है जो दिखे, उसे जिम्मेदारी से लिखना, क्योंकि कलम की स्याही सूख सकती है, लेकिन जनता की परेशानी नहीं।
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